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Ahiṃsā and Anekānta
Ahiṃsā aura anekānta
इस लेख के लेखक पं० बेचरदासजी श्वे० जैन समाज के गण्य-मान्य, उदारहृदय विद्वानों में से एक हैं। आप प्राकृत व्याकरण आदि अनेक ग्रंथों के लेखक, अनुवादक तथा संपादक हैं। साम्प्रदायिक कट्टरता से दूर रहते हैं और अहमदाबाद के गुजरात-पुरातत्त्व-मंदिर में एक ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित हैं। ‘अनेकान्त’ के लिये आपने लेख देना स्वीकार किया था परंतु एकाएक आप भयंकर नेत्र रोग से पीड़ित हो गये और डेढ़ महीने से असह्य वेदना उठा रहे हैं। ऐसी हालत में कोई आशा नहीं थी कि ‘अनेकान्त’ के प्रथमांक में आपके लेख का सौभाग्य प्राप्त होगा। फिर भी संदेशविषयक मेरे अनुरोध को पाकर आपने रोग शय्या पर पड़े-पड़े ही यह छोटा सा लेख लिखकर भेजा है, जो आकार में छोटा होने पर भी बड़े महत्त्व का है। इस वीरोचित उत्साह तथा सत्कार्य-सहयोग के लिये आप विशेष धन्यवाद के पात्र हैं। हार्दिक भावना है, कि आप शीघ्र से शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करें और अनेकान्त के पाठकों को आपके गवेषणापूर्ण लेखों के पढ़ने का पूरा अवसर मिले। —संपादक ‘अहिंसा’ और ‘अनेकान्त’ ये दोनों शब्द एक तरह से पर्यायवाची हैं। यद्यपि व्याकरण, व्युत्पत्ति और शब्दकोश की दृष्टि से इनका पर्याय वाचक होना लगभग अप्रसिद्ध जैसा है, फिर भी तत्त्वदृष्टि से विचारा जाय तो ये दोनों शब्द बिलकुल पर्याय-वाचक हैं, ऐसा कहने में कोई बाधा नहीं है। जो मनुष्य अहिंसा धर्म का पालन करेगा उसकी दृष्टि, उसका आचार-विचार यदि अनेकान्त की जड़ पर न होगा तो वह शख्स कभी अहिंसा का वास्तविक पालन नहीं कर सकता और जिस मनुष्य की दृष्टि और उसका आचार-विचार अनेकान्त को लक्ष्य करके बना होगा वह अवश्य अहिंसा का वास्तविक पालन कर सकता है। अर्थात् जहाँ-जहाँ अहिंसा का पालन होता है वहाँ उसके गर्भ में अनेकान्त का वास जरूर रहता है। और जहा
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श्रीमान् पं० बेचरदासजी, न्याय-व्याकरणतीर्थ. "Ahiṃsā and Anekānta." अनेकान्त 1 (1930): 53–66.
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