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The Bhagavatī Ārādhanā and Its Commentaries
Bhagavatī Ārādhanā aura usakī ṭīkāeṃ
जैन समाज में ‘भगवती आराधना’ नाम का एक बहुत ही प्रसिद्ध तथा प्राचीन ग्रन्थ है। यह शौरसेनी प्राकृत भाषा में है और इसमें सब मिला कर 2166 गाथाएँ हैं। इनमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक् तपरूप चार आराधनाओं का विवेचन है। यह प्रधानतः मुनि धर्म का ग्रन्थ है। मुनिधर्म की अन्तिम सफलता शान्तिपूर्वक समाधिमरण है और इस समाधिमरण का पण्डितपण्डितमरण, पण्डितमरण आदि का - इसमें ___ और विस्तृत विवेचन है। दिगम्बर सम्प्रदाय में इस विषय को इतने विस्तार से समझाने वाला यही सबसे पहला ग्रन्थ उपलब्ध है। अन्य सब ग्रंथों में इस विषय पर जो कुछ थोड़ा बहुत लिखा हुआ मिलता है, वह प्रायः इसके बाद का और संभवतः इसी के आधार से लिखा हुआ है। इसका मंगलाचरण यह है :- सिद्धे जयप्पसिद्धे चउव्विहाराहणाफलं पत्ते। वंदित्ता अरिहंते वुच्छं आराहणा कमसो॥ अन्त में ग्रन्थकर्त्ता आचार्य अपना परिचय इस प्रकार देते हैं :- अज्जजिणणंदिगणिसव्वगुत्तगणि अज्जमित्तणंदीणं अवगमिय पादमूले सम्मं सुत्तं च अत्थं च।। 2161 ॥ पुव्वायरियणिबद्धा उवजीवित्ता इमा ससत्तीए। आराधना सिवज्जेण पाणिदलभोजिणा रइदा॥ 62 ॥ छदुमत्थदाए इत्थदु जं वद्धं होज्ज पवयणविरुद्धं। सोधिंतु सुगीदत्था पवयणवच्छल्लदाए दु॥ 63 ॥ आराधना भगवदी एवं भत्तीए वण्णिदा संती। संघस्स सिवज्जस्स य समाधिवरमुत्तमं देउ॥ 64 ॥ असुरसुरमणुअकिण्णररविससिकिंपुरिसमहियवरच रणो दिसउममबोहिलाहं जिणवरवीरोतिहुवणिंदो॥ 65 ॥ खमदमणियमधराणंधुदरयसुहदुक्खविप्पजुत्ताणं। णाणुज्जोदियसल्लेहणम्मि सुणमोजिनवराणं॥ 66 ॥ अर्थात् - आर्य जिननन्दि गणि, आर्य सर्वगुप्त गणि और आर्य मित्रनन्दि गणि के चरणों के निकट अच्छी तरह सूत्र और अर्थ को समझ करके, पूर्वाचार्यों की निबद्ध की हुई रचना के आधार से पाणिदलभोजी (करतल पर लेक
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श्रीयुत पं० नाथरामजी प्रेमी. "The Bhagavatī Ārādhanā and Its Commentaries." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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