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The Bhagavatī Ārādhanā and Its Commentaries (continued)
Bhagavatī Ārādhanā aura usakī ṭīkāeṃ (gatāṅka se āge)
1-विनयोदया टीका पूने के भाण्डारकर प्राच्यविद्यासंशोधक मन्दिर में इसकी दो हस्तलिखित प्रतियाँ मौजूद हैं जिन्हें मैंने देखा है। इन में से पहली सवाई जयपुर नगर में संवत् 1800 में और दूसरी मथुरा में संवत् 1885 में लिखी गई थी। इस टीका के कर्त्ता अपराजित सूरि हैं। जो चन्द्रनन्दि नामक महाकर्मप्रकृत्याचार्य के प्रशिष्य और बलदेव सूरि के शिष्य थे, आरातीय आचार्यों के चुडामणि थे, जिनशासन का उद्धार करने में धीर-वीर तथा यशस्वी थे और नागनन्दि गणि के चरणों की सेवा से उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। श्रीनन्दिगणि की प्रेरणा से उन्होंने यह विनयोदया टीका लिखी थी। ग्रन्थ के आद्यन्त अंश नीचे दिये जाते हैं- प्रारंभ – ॐ नमः सिद्धेभ्यः। दर्शनज्ञान चारित्र तपसामाराधनायाः स्वरूपं विकल्पं तदुपाय-साधकान् सहायान् फलं च प्रतिपादयितुमुद्यतस्य (स्यास्य) शास्त्रस्यादौ मंगलं स्वस्य श्रोतृणां च प्रारब्धकार्यप्रत्यूह-निराकृतौ क्षमं शुभपरिणामं विदधता तदुपायभूतेयमरचि गाथा सिद्धे जयप्पसिद्धे इत्यादिका। अन्त- नमः सकलतत्त्वार्थप्रकाशकनमहौजसे भव्यचक्रमहाचूडारत्नाय सुखदायिने ॥ 1 ॥ श्रुतायाज्ञानतमसः प्रोद्यद्धर्मांशवे तथा। केवलज्ञानसाम्राज्यभाजे भव्यैकवान्धवे ॥ 2 ॥ चन्द्रनन्दिमहाकर्मप्रकृत्याचार्य-प्रशिष्येण आरातीयसूरिचूलामणिना नागनन्दिगणि-पादपद्मोपसेवाजातमतिलवेन बलदेवसूरि-शिष्येण जिनशासनोद्धरणधीरेण लब्धयशः प्रसरेणापराजितसूरिणा श्रीनन्दिगणिना वचोदितेन रचिता आराधनाटीका श्रीविजयोदया नाम्ना समाप्ता ।। छ ।। एवं भगवती आराधना समाप्ता। इति श्रीभगवती आराधना-टीकायां श्रीविजयोदया नाम्ना समाप्ता ।। छ ।। शुभं भवतु। संवत् 1885 वर्षे श्रीसूर्ये उत्तरायणे हेमन्तऋतौ महामांगल्यप्रतिमरसोत्तममासे पौषमासे शुभे शुक्लपक्षे तिथौ तृतीयायां 3 गुरुवा
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श्री० पं० नाथूरामजी प्रेमी. "The Bhagavatī Ārādhanā and Its Commentaries (continued)." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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