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Indian Philosophy
Bhāratīya darśanaśāstra
[यह लेख एक अजैन बन्धु का लिखा हुआ है और श्रीवेंकटेश्वर-समाचार के गत विशेषांक में प्रकट हुआ है। इसमें भारतीय दर्शनशास्त्रों पर विचार करते हुए जैन दर्शन पर भी कुछ तुलनात्मक विचार किया गया है। विद्वान् लेखक ने जैनग्रंथों के अध्ययन का कहाँ तक परिश्रम किया है, वे कहाँ तक उन पर से वस्तुतत्व को ग्रहण करने आदि में सफल हो सके हैं और जैनदर्शन के विषय में उनके क्या कुछ विचार हैं, इसका ‘अनेकान्त’ के पाठकों को परिचय कराने के लिये ही यह लेख यहाँ पर दिया जाता है। लेखक महाशय का यह लिखना बिलकुल ठीक है कि, जैन दर्शन के सम्बंध में बहुत सी भ्रान्त कल्पनाएँ प्रचलित हो गई हैं, इसका कारण वास्तव में जैनसाहित्य का अप्रचार है। ज्यों-ज्यों जैनसाहित्य प्रकाश में आता जाता है और सर्वसाधारण को जैनग्रन्थों की प्राप्ति का मार्ग सुगम होता जाता है त्यों-त्यों भ्रान्त कल्पनाएँ तथा मिथ्या धारणाएँ भी दूर होती जाती हैं और बहुत से उदार हृदय निष्पक्ष विद्वान् जैन दर्शन के विषय में अपने ऊँचे विचार प्रकट करने लगे हैं, यह निःसन्देह एक आनंद का विषय है। - सम्पादक] भारतीय दर्शनशास्त्र इस असार संसार के परम दुस्तर, आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक परितापों से परमसन्तप्त करुणक्रन्दन करने वाले व्यथित जीवों को आनंद के अगाध पारावार में निमग्न करा देने की अपूर्व शक्ति रखते हैं। भारत के विज्ञान की चरम सीमा के युग का स्मरण, दर्शनशास्त्र की याद आते ही, हो जाता है। बिना उन्नति की चरमसीमा को पार किये दर्शनशास्त्र का विकास नहीं होता। भारतीय दर्शनों पर टीका टिप्पणीकारों में सुप्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान मोक्षमूलर ने, भारतीय दर्शनों की समीक्षा करते हुए लिखा है:- “कोई भी देश विज्ञान की परिपूर्ण उन्नति किये बिना ऐसे दर्शनों का आविष्कार नहीं
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श्रीयुत पं० माधवाचार्य्य रिसर्च स्कालर. "Indian Philosophy." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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