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Devgarh
Devagaṛha
जी. आई. पी. रेलवे लाइन जो देहली से बम्बई को गई है, उसी पर ललितपुर स्टेशन है। ललितपुर से दक्षिण की ओर दूसरा स्टेशन जाखलौन है, यहाँ से देवगढ़ 9 मील बैल गाड़ी का रास्ता है पैदल का मार्ग करीब 7 मील का है। मार्ग पहाड़ी घाटियों में हो कर है। देवगढ़ ग्राम बहुत छोटा सा ऊजड़ ग्राम समान है। यहाँ पर खाने पीने का कुछ भी सामान नहीं मिलता है, इसके लिए जाखलौन से प्रबंध करना होता है। ठहरने के लिए पहले सिवाय डाकबंगले के और कोई भी सुरक्षित स्थान नहीं था; किन्तु अब वहाँ एक जैन धर्मशाला बन गई है जिसमें पचास, साठ यात्री एक साथ बड़े आराम के साथ ठहर सकते हैं। यहाँ एक जैन पुजारी के सिवाय और कोई भी घर जैनियों का नहीं। आबादी अभी क़रीब सौ, सवा सौ की है जिनमें अधिकतर संख्या सहरियों की है। ब्राह्मणों और अहीरों के तो बहुत ही कम घर हैं। देवगढ़ ग्राम बेतवा नदी के मुहाने पर नीची जगह पर बसा हुआ है। यहाँ से 300 फुट की ऊँचाई पर करनाली का दुर्ग है जिसके पश्चिम की ओर बेतवा नदी कलकल निनाद करती हुई बहती रहती है। इस पर्वत की चढ़ाई सोनागिर के समान सरल तथा सीधी है। पहाड़ी की चढ़ाई तय करने पर एक खंडहर द्वार मिलता है जिसको ‘कुँजद्वार’ कहते हैं। यह द्वार पर्वत की परिधि को बेढ़े हुए कोट का द्वार है। इस द्वार को प्रवेश करते ही जीर्ण दो कोट और मिलते हैं। दूसरा और तीसरा कोट मंदिरों को घेरे हुए है। इन कोटों के अन्दर देवालय होने से ही संभवतः इसका नाम देवगढ़ पड़ा होगा। इसके भीतर सैंकड़ों जैन मंदिरों के भग्नावशेष पाए जाते हैं। सैकड़ों क्या हजारों जैन मूर्तियाँ पर्वत पर औंधी सीधी पड़ी हुई यत्र तत्र पाई जाती हैं। बहुत ही छोटे छोटे मंदिरों को छोड़ कर बाक़ी के मंदिर तीस हैं जिनमें अनुपम प्राचीन कारीगरी पाई जाती है। ये सब मंदिर क़रीब
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श्री० नाथूरामजी सिंघई. "Devgarh." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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