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Our Education
Hamārī śikṣā
“विद्या सर्वार्थसाधिनी” – भगवत् जिनसेनाचार्य। Education alone can conduct us to that which is at once best in quality and infinite in quantity. Horace Monk. “केवल शिक्षा ही हमें उस तक ले जा सकती है जो उच्च कोटि का और अनंत है।” शिक्षा का महत्व ज्ञानवाद के इस युग में शिक्षा के महत्व से प्रायः सब ही परिचित हैं। सब ही बहुत अंशों में यह जानते हैं कि शिक्षा से मनुष्य के हृदय में एक अद्भुत प्रकाश होता है। शिक्षा ही के द्वारा मनुष्य की मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों का पूर्ण रूप से विकाश होता है। सुशिक्षित सदस्यों का समाज ही संसार में सब गुणों को प्राप्त करके सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक उन्नति करने में समर्थ होता है। शिक्षित समाज ही अपने अस्तित्व को गौरव के साथ स्थिर रख सकता है और मूर्ख समाज - अपढ़ समाज - समय और प्रकृति के प्रबल वेग के सामने नष्ट हो जाता है। जिनके पास शिक्षा का चिंतामणि रत्न है, जिनके यहां विद्यारूपी कामधेनु है, वे महान् धनी हैं और संसार की सब वस्तुएँ उनके सामने तुच्छ हैं। विद्वान् ही बलवान है और अशिक्षित महान् शक्ति धारी होते हुए भी निर्बल है। कहने का तात्पर्य यही है कि शिक्षा मानवी उन्नति के वास्ते अत्यंत आवश्यक साधन है। जैनसमाज और शिक्षा इससे पहले कि पाठक महाशय जैन समाज में शिक्षा का प्रचार और उसका हिसाब जानने का प्रयत्न करें वे पहिले नीचे के बड़े कोष्टक को देख लें। उनको बहुत हद तक उससे यह मालूम हो जायगा कि हमारा समाज शिक्षा नामक भुषण से कितना अलंकृत है? सन् 1921 में समस्त भारत में जैनियों की संख्या 11,78,596 थी, उनमें से केवल 3,56,879 जैनी शिक्षित थे, अर्थात् 29.635 प्रतिशत। इनमें पुरुषों और स्त्रियों के पृथक्-पृथक् अंक इस प्रकार थे। 6,10,279 पुरुषों में
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बाबू माईदयाल जी, बी० ए० (आनर्स). "Our Education." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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