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The Ahiṃsā of the Jains
Jainoṃ kī ahiṃsā
महात्मा गान्धी ने जब से देशोद्धार के लिये बिगुल बजाया है और उसका साधन अहिंसा को बताया है, तब से भारत का लोकमत हिंसा-अहिंसा के स्वरूप समझने में सजग हो रहा है। और उसकी उपयोगिता - अनुपयोगिता के विषय में ऊहापोह करने लगा है। जैनधर्मानुसार अहिंसा तत्त्व का खास महत्व है- वह उसका एक उत्तम सिद्धान्त है। जब उसकी सम्यक् आराधना से आत्मा परमात्मा हो सकता है- कर्मबन्धन से छूट सकता है-तब अन्य राष्ट्रीय पारतंत्र्य से छूटना कौन बड़ी बात है? वह तो अहिंसा की सम्यगाराधना के द्वारा सहज साध्य है। अतः आज जैनदृष्टि से अहिंसा विषय में ही कुछ विचार प्रस्तुत किया जाता है। प्रमाद के योग से प्राणों के व्यपरोपण को ‘हिंसा’ कहते हैं। ‘प्रमाद’ शब्द का अर्थ काम-क्रोधादिक विकार, ‘प्राण’ शब्द का अर्थ आत्मा के स्वाभाविक विवेक आदि सद्गुण, और ‘व्यपरोपण’ शब्द का अर्थ घात है। अर्थात् क्रोधादि विकारों के योग से आत्मा के विवेकादि गुणों का जो घात होता है उसे हिंसा कहते हैं। हिंसा के द्रव्य और भाव के भेद से ‘द्रव्यहिंसा’ और ‘भावहिंसा’ ऐसे दो भेद हैं, और ये भी फिर स्व-पर के भेद से दो दो भेदरूप हो जाते हैं। इनमें से भावहिंसा की साधक बाह्य क्रियाओं को अथवा द्रव्यप्राणों के घात को ‘द्रव्य-हिंसा’ और उसके निमित्तादि से रागादिक भावों की उत्पत्ति होकर जो भावप्राणों का घात होता है उसे ‘भावहिंसा’ कहते हैं। वास्तव में यह भावहिंसा ही हिंसा है, बिना भावहिंसा के कोरी द्रव्यहिंसा हिंसा नहीं कही जाती है। अस्तु; इस हिंसा के न होने का ही नाम अहिंसा है। यह अहिंसा श्रावक और यतियों के भेद से दो प्रकार की है। राष्ट्रोद्धार का मुख्य संबंध गृहस्थाश्रम से होने के कारण इस लेख में श्रावकों अथवा गृहस्थधर्म के अनुयायी जैनों की अहिंसा पर ही विचार
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श्री० व्याख्यानवाचस्पति पं० देवकीनंदनजी, सिद्धान्तशास्त्री]. "The Ahiṃsā of the Jains." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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