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The Great Poet Ranna
Mahākavi Ranna
यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि, इस पृथ्वीमंडल में जो कुछ भी जैन धर्म का अस्तित्व है उसमें पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ग्रन्थ रत्न ही मुख्य कारण हैं। हमारे पूज्य पूर्वजों ने जिस तरह संस्कृत तथा प्राकृत भाषा के ग्रन्थ रचकर जैन धर्म के प्रचार का परिश्रम उठाया है, उसी तरह उन्होंने प्रान्तीय भाषाओं में भी अनेक ग्रन्थ रत्न लिखकर जैन धर्म के प्रसार का महान् कार्य किया है। कर्णाटक तथा तामिल भाषा की आत्मा जैन विद्वानों की कृतियाँ ही हैं, और यह कूपमण्डूक की तरह मैं ही नहीं कह रहा हूँ; किन्तु उन भाषाओं के धुरन्धरों की भी यही सम्मति है। कर्णाटक में जैन धर्म का जो कुछ भी गौरव है उसमें मुख्य कारण कर्णाटकीय जैन विद्वानों की कृतियाँ ही हैं। जैन विद्वानों ने इस भाषा में असंख्य अमूल्य ग्रन्थ रचे हैं। यदि जैन साहित्य को कर्णाटक भाषा से अलग कर दिया जाय तो कर्णाटक भाषा का स्वरूप ही न रहेगा, ऐसी ही सम्मति उस भाषा के जैनेतर विद्वानों की है, वास्तव में कर्णाटक भाषा के कालिदास, तुलसीदास और सूर, जैन विद्वान् ही हैं। और इस बात का खास प्रमाण पम्प, पोन्न तथा रन्न की जयन्तियाँ हैं, जो कि जैनेतर विद्वानों ने समय-समय पर मैसूर तथा धारवाड़ आदि स्थानों पर मनाई हैं। कर्णाटक भाषा के विषय में ये तीनों कवि रत्नत्रय गिने जाते हैं। पम्प के आदिपुराण, पोन्न के शान्तिनाथपुराण तथा रन्न के अजितनाथ पुराण के मर्मज्ञ ही कर्णाटक भाषा के प्रौढ़ विद्वान गिने जाते हैं। इसीलिये कर्णाटक भाषा की उच्च कक्षा की पढ़ाई में जैन ग्रन्थों ने ही सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है। कर्णाटक के प्राचीन उद्भट विद्वानों ने प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग का अतीव सुन्दर सुललित भाषा में वर्णन किया है। गोम्मटसार की टीका भी इस भाषा में उ
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श्रीयुत् पं० बी० शांतिराजजी शास्त्री. "The Great Poet Ranna." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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