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The Great Poet Śrī Haricandra on Statecraft
Mahākavi Śrī Haricandra kā rājanīti varṇana
प्राचीन संस्कृत साहित्य-सागर का मन्थन करने से संस्कृत-कवियों के विशाल अध्ययन, सार्वविषयक पांडित्य, तथा बहुदृष्टिता का अपूर्व दिग्दर्शन मिलता है। जहाँ उन्होंने कविता-कामिनी को शृंगार रस से शृंगारित किया है वहाँ समाज-शास्त्र, प्रकृति वर्णन, अध्यात्म, एवं राजनीति जैसे विद्वत्प्रिय मनोहारि अलंकारों से अलंकृत भी किया है। कविगण राष्ट्र के प्राण होते हैं, उनके शब्दों में वह अपूर्व शक्ति होती है जो मुर्दा दिलों को जिन्दा, कायर को वीर और रण से भागती हुई सेना को “मृत्वा वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे सद्दीं” की स्मृति करा कर रण विजयिनी बनाती है। वास्तव में कवि के सदृश राजा का सच्चा मित्र दूसरा नहीं। इसी से धर्मशर्माभ्युदय में राजनीति का वर्णन करते हुए, कवि महोदय लिखते हैं- विच रयैतद्यदि केऽपि बान्धवा- महाकविभ्योऽपि परे महीभुजः। यदीयसूक्तामृतसीकरैरसौ गतोऽपि पञ्चत्वमिहाशु जीवति॥ 18-41 ॥ ‘महाकवियों से अधिक नरेशों का कोई बांधव नहीं है, जिनके वचनामृत के सिंचन से मुर्दादिल भी जिन्दा हो जाते हैं, अथवा मृत्यु को प्राप्त होने पर भी लोक में उनका जीवन-यशःशरीर बना रहता है।’ अब जरा उन्हीं मृतों को जिलाने वाले महाकवियों में गणनीय कविश्रेष्ठ श्री हरिचन्द्र जी की राजनीति का कुछ वर्णन सुनिये। यह वर्णन उन्होंने धर्मशर्माभ्युदय के 18वें सर्ग में राजा महासेन के मुख से धर्मनाथ के प्रति कराया है। अर्थात्, राजा महासेन क्षणभंगुर सांसारिक भोगों से विरक्त होकर अपने पुत्र श्री धर्मनाथ को राज्यतिलक करके बन को जाना चाहते हैं। श्री धर्मनाथ, यद्यपि, तीर्थंकर होने के कारण जन्म से ही मति, श्रुत, अवधि इन तीन ज्ञान से युक्त हैं, फिर भी राजा पुत्रमोह के कारण या राजनीति के नियमानुसार उन्हें राज्याभिषेक से पूर्
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श्रीयुत पं० कैलाशचंद्रजी. "The Great Poet Śrī Haricandra on Statecraft." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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