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The Duty of Man
Manuṣya kartavya
केवल मनुष्य पर्याय में जन्म ले लेने से ही कोई मनुष्य नहीं कहा जा सकता; बल्कि जो मननशील हों हेयादेय के विवेक से विभूषित हों-सभ्य, शिष्ट, स्वपरोपकारी एवं कर्तव्यनिष्ठ हों वे ही सज्जन वास्तव में मनुष्य कहलाने के अधिकारी हैं। श्रीनेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ति ने मनुष्य शब्द की निरुक्ति में कहा है- मण्णंति जदो णिच्चं मणेण लिउणा मणुक्कडाजम्हा मणुव्भवा य सव्वे तम्हा ते माणुसा भणिदा। अर्थात् - जो नित्य ही मन के द्वारा भली भांति हेय-उपादेय के विचार करने में निपुण हों- गुणदोषादि के विचार तथा स्मरणादि जिनमें उत्कटरूप से पाये जावें- और जो साथ ही कर्मभूमि की आदि में उत्पन्न होने वाले मनुओं (कुलकरों) की संतान हों उन्हें मनुष्य कहते हैं। ‘कर्तुं योग्यं कर्तव्यं’- जो करने योग्य हो, जिसे करना चाहिए, जिसके किये बिना मनुष्य को सफलता नहीं मिल सकती उसे कर्तव्य कहते हैं। मनुष्यों के योग्य जो कर्तव्य वह मनुष्य कर्तव्य है। परिस्थितियों की अपेक्षा मनुष्य-कर्तव्य असंख्य हैं; परन्तु जब उन्हें संग्रहनय में ग्रहण करते हैं तो वे सब दो कोटियों में आजाते हैं- 1 लौकिक कर्तव्य और 2 पारमार्थिक कर्तव्य। लौकिक कर्तव्य वे हैं जो मनुष्य को प्रत्येक लौकिक (आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक आदि) उन्नति में सफलता दिलावें तथा जिनसे मानव क्रमशः पारमार्थिक कर्तव्य पालन के योग्य बन सकें। उन लौकिक कर्तव्यों के तीन भेद हैं- 1 धार्मिक 2 आर्थिक और 3 कामिक। ‘धार्मिक कर्तव्य’ उन्हें कहते हैं जो अशुभ अर्थात् पाप से निवृत्ति और शुभ अर्थात् पुण्य में प्रवृति कराने में सहायक हों, जिन में कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) घटे, इन्द्रियलोलुपता मिटे और मनुष्य आत्मिक उन्नति करने में समर्थ हो सकें। जीवदया, सत्यभाषण, अस्तेय, शील,
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श्री० पं० मुन्नालालजी विशारद. "The Duty of Man." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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