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The Khāravela Praśasti and the Antiquity of Jainism
Śrī Khāravela praśasti aura Jainadharma kī prācīnatā
इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान् जायसवाल जी का यह लेख नागरीप्रचारिणी पत्रिका के हाल के (भाग 10 के) अंक नं० 3 में प्रकट हुआ है। इसमें जैनसम्राट् खारवेल, उनके शिलालेख तथा जैनधर्म की प्राचीनता आदि के विषय में जो कुछ कहा गया है वह जैन विद्वानों के जानने तथा विचार करने योग्य है। लेखक महाशय भी कुछ नामों की बाबत उनसे यह जानना चाहते हैं कि वे किसी जैन ग्रन्थ में उल्लेखित मिलते हैं या कि नहीं। उनकी इस इच्छा को कुछ अंशों में पूरा करने वाला मुनि कल्याणविजय जी का एक लेख भी इस किरण में प्रकाशित हो रहा है और दूसरे बा० कामताप्रसाद जी के लेख पर भी इससे कुछ प्रकाश पड़ता है। इन सब बातों की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए ही यह लेख यहाँ पर दिया जाता है। -सम्पादक। चक्रवर्ती अशोक मौर्य के शिलालेख में जैन भिक्षुओं की चर्चा (निगंठ अर्थात्) निर्ग्रन्थ नाम से आई है। पर वह उल्लेख मात्र है। वस्तुतः सबसे पहला जैन शिलालेख वह है जो उड़ीसा के भुवनेश्वर-समीपवर्ती खंडगिरी-उदयगिरि पहाड़ की हाथीगुफा नामधेय गुहा पर खुदा हुआ है। यह कलिंगाधिपति चेदिवंशवर्द्धन महाराज खारवेल का लिखाया हुआ है। इस राजा का प्रताप एक बार चन्द्रगुप्त और अशोक का सा चमका। सारे भारतवर्ष में, पांड्यदेश के राजा से लेकर उत्तरापथ, तथा मगध से लेकर महाराष्ट्र देश तक इस की विजय वैजयंती फहराई। मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही भारतवर्ष के साम्राज्य सिंहासन पर चढ़ने की कामना चार आदमियों को हुई। एक तो पटना के मौर्य सेनापति पुष्यमित्र शुंगवंशीय ब्राह्मण थे जो नालंदा में पैदा हुए थे। दूसरे सातवाहनीय शातकर्णी जो दक्षिणापथ के राजा कहलाते थे, तथा महाराष्ट्र देश और अंध्र देश के बीच पश्चिम देश में राज्य करते थे। इनका भी एक ही पुश्त का नया राज्य था, ये भी ब्राह्मण
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श्री काशीप्रसाद जायसवाल. "The Khāravela Praśasti and the Antiquity of Jainism." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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