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First Principles of Preserving Health
Svāsthya rakṣā ke mūlamantra
इस संसार में हमारे अनेकों प्रधान कार्यों में से प्रमुख कर्तव्य अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना है। मेरी कामना है कि ‘सर्व संसार नीरोग रहे’। संसार का प्रत्येक कार्य चाहे वह सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं पारमार्थिक तथा आर्थिक दृष्टि से किसी भी अवस्था का हो—उच्च तथा अधम किसी भी श्रेणी में विभाजित किया गया हो—उसके निभाने, पूरा करने तथा सुचारु-उपभोग करने के लिये शरीर का आरोग्य-स्वस्थ रहना—नितान्त आवश्यक है। यदि हमारी शरीर प्रकृति अच्छी नहीं है तो जान लीजिए हम संसार में किसी भी योग्य नहीं हैं; औरों का उपकार तो क्या, हम स्वयं अपना लघुतम कार्य करने में भी असमर्थ हैं। स्वस्थ मनुष्य अत्यन्त हीनावस्था होने पर भी सुख का अनुभव कर सकता है, और जो रोगी है उसके सम्मुख चक्रवर्ती का ऐश्वर्य भी तुच्छाति तुच्छ है—आनन्ददायक नहीं। बड़े-बड़े महारथी छत्रपति शिवा जैसे शूरवीर भी, जिनकी हुँकार से पृथ्वी हिल जाती थी और जिनके सम्मुख बड़े-बड़े योद्धा धैर्य त्याग देते थे, जब व्याधि-व्यथा से पीड़ित होकर शय्या-शायी हो गए तब अबोध शिशु की तरह रोते और बिलखते थे; बड़े-बड़े विज्ञान-विशारद, जिनके विज्ञान-चातुर्य से अनेकों कार्य ऐसे हो रहे हैं जिनको देख कर लोग आश्चर्यचकित होते हैं, वे भी जब रोग-ग्रस्त होते हैं तब मूर्खों के समान अधीर हो कर रोते देखे गये हैं। रोगावस्था में धनी को धन, बली को बल, विद्वान को विद्या, एवं राजा को राज्य भी प्यारा नहीं लगता,—यहाँ तक कि, प्यारे पुत्र-कलत्र, दास, दासी, घर, दुकान, सब कुछ दुःख के ही हेतु प्रतीत होते हैं। और इसलिये कहना पड़ता है कि संसार में स्वास्थ्य (आरोग्य) के समान दूसरा पदार्थ नहीं है। प्रायः देखा जाना है कि वर्तमान भारतीय-परिस्थिति में शिक्षित-अशिक्षित सभी समान रूप से स्वास्थ्योन्नति
Transcribed from the prepared edition. This is the beginning of the article, not a summary — open the PDF to read it in full.
श्रीमान् राजवैद्य पं. शीतलप्रसादजी. "First Principles of Preserving Health." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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