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Ancient Jain Temples of the Tuluva Country
Taulava-deśīya prācīna Jaina-mandira
- श्री० पं० लोकनाथजी शास्त्री मूड़बिद्री दक्षिण कर्नाटक में जैन धर्म की प्राचीनता और जैन मंदिरों का विषय इतिहास-प्रेमियों के लिये जितना अत्यावश्यक है उतना ही वह गहन तथा रहस्यपूर्ण भी है, इसे इतिहास-खोजियों को सदा ध्यान में रखना चाहिये। इस देश में घर की आम बोलचाल की भाषा तुलु होने के कारण इसको ‘तुलुदेश’ या ‘तौलवदेश’ कहते हैं और व्यावहारिक भाषा कन्नड होने से इसको ‘कर्नाटक’ देश भी कहा जाता है। यह कर्नाटक देश किसी समय कांची के राज्य में शामिल था, जिसकी पुरानी राजधानी बीजापुर जिले के अन्तर्गत बादामपुर (बादामी) थी। उसके पश्चात उत्तर कनाडा में स्थित बनवासी के प्राचीन कदंब राजाओं ने इस पर राज्य किया। और छठी शताब्दी के क़रीब यह देश पूर्वीय चालुक्यों के अधिकार में चला गया। इस देश के राजा-महाराजाओं का धर्म जैन धर्म था और इस धर्म का प्रभाव उस समय तक अक्षुण्ण तथा अप्रतिहत बना रहा जब तक कि विष्णुवर्धन, होयसाल, बल्लाल, जैन धर्म को त्याग कर वैष्णवधर्मी नहीं बने थे। उनके वैष्णवधर्मी बनते ही स्थानीय जैन राजा-भैरसूड ओडेयर स्वतंत्र हो गये और उन्होंने ऐसा शासन जमाया कि जो अन्य मतियों को विरुद्ध पड़ने लगा। उनके अधीन चौटर, बंगर, अजिलर वगैरह बहुत से प्रसिद्ध-प्रसिद्ध राजा थे। वे जैन राजा अभी भी इस भांति प्रसिद्ध हैं, (1) मूडबिद्री में चौटर, (2) नंदावर के बंगर, (3) अलदंगडी के अजिलर, (5) मूल्की के सेवंतर इत्यादि। इस दक्षिण तौलवदेश के उक्त प्रसिद्ध राजाओं ने यहाँ पर बहुत से जैन मंदिर बनवाये हैं। प्राचीन और अर्वाचीन सब मिला कर मंदिरों की संख्या यहाँ 180 पाई जाती है और उसकी तफ़सील यह है कि मूडबिद्री में 18, कार्कल में 18, वेणूर में 8, मूल्की होसंगडी में 8, संगीतपुर (हाडुवल्ली) 9, गेरोप्पे में 4, दक्षिण कना
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श्री० पं० लोकनाथजी शास्त्री मूड़बिद्री. "Ancient Jain Temples of the Tuluva Country." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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