Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
भगवान महावीर और उनका समय
Lord Mahāvīra and His Times
Bhagavāna Mahāvīra aura unakā samaya
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In Search of Old Records
Purānī bātoṃ kī khoja
(6) एक और ‘भगवती आराधना’ ‘भगवती आराधना’ नाम का जो प्राचीन ग्रंथ जैन-समाज में प्रसिद्ध है और जिसका परिचय ‘अनेकान्त’ की तीसरी किरण से पाठक पढ़ रहे हैं उससे भिन्न एक और भी ‘भगवती आराधना’ नाम का ग्रन्थ है। यह ग्रंथ प्राकृत भाषा में नहीं किन्तु संस्कृत भाषा में है और समाज के प्रसिद्ध विद्वान् अमितगति आचार्य ने रचा है। ये आचार्य माधवसेन के शिष्य और नेमिषेणाचार्य के प्रशिष्य हैं और इस लिये 11वीं शताब्दी के विद्वान वे ही अमितगति हैं जो धर्मपरीक्षा, उपासकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह आदि ग्रंथों के प्रसिद्ध रचयिता हैं। इनके रचे हुए अभी तक जितने ग्रंथ उपलब्ध हुए थे अथवा सुहृद्वर पं० नाथूरामजी प्रेमी-द्वारा विद्वद्रत्नमाला में इनके और जितने ग्रन्थों की सूचना दी गई थी उन सबसे यह एक जुदा ही ग्रन्थ है। इसे आचार्य महोदय ने बड़े उद्यम के साथ चार महीने में बना कर समाप्त किया है। परंतु कौन से संवत में बना कर समाप्त किया, यह ग्रन्थप्रति पर से मालूम नहीं हो सका। हाँ, इतना जरूर मालूम हुआ है कि इसकी रचना उन्होंने अपने पहले के बने हुए किसी जिनागम पर से की है, जो संभवतः वही प्राचीन ‘भगवती आराधना’ जान पड़ता है जो प्राकृत भाषा में निबद्ध है तथा छप कर प्रकाशित भी हो चुका है, और इसे उसकी अपेक्षा ऐसे ही महार्घ (बहुमूल्य) बतलाया है जैसे कि दूध से निकला हुआ घी। 11वीं शताब्दी में इस दूसरे ‘भगवती आराधना’ ग्रंथ की रचना हो जाने के कारण ही पं आशाधरजी ने पहले ग्रन्थ की टीका लिखते हुए उसे ‘मूलाराधना’ नाम दिया है और अपनी टीका (विवरण) का नाम ‘मूलाराधना-दर्पण’ रक्खा है, ऐसा मालूम होता है। अस्तु; इस ग्रन्थ की एक प्रति ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन, बम्बई में मौजूद है, जिसकी पत्र संख्या 81 है परंतु उसमें पहला पत्र नहीं है। इसी से
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जुगलकिशोर मुख्तार. "In Search of Old Records." अनेकान्त 1 (1930): 210–219.
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