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Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
The Limits of Anekāntavāda
Anekāntavāda kī maryādā
इस लेख के लेखक पं० सुखलालजी श्वेताम्बर जैन समाज के एक प्रसिद्ध बहुश्रुत विद्वान हैं। आपने दर्शन शास्त्रों तथा जैन सिद्धान्तों का अच्छा अभ्यास किया है और कितने ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। गत वर्ष कुछ मास के लिये मुझे आपके सत्संग में रहने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। आप साम्प्रदायिक कट्टरता से रहित बड़े ही मिलनसार तथा उदार हृदय सज्जन हैं और ब्रह्मचर्य के साथ सादा जीवन व्यतीत करते हैं। न्याय तथा व्याकरण की अनेक ऊँची उपाधियों से विभूषित होने पर भी आप कभी अपने नाम के साथ उनका उपयोग नहीं करते। कई वर्ष से महात्मा गांधी जी के गुजरात-पुरातत्व-मंदिर में आप एक ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित हैं और ‘सम्मति तर्क’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ का बड़ी योग्यता के साथ संपादन कर रहे हैं। यह मार्मिक लेख आपने मेरी प्रार्थना को मान देते हुए लिख भेजा है, जिसके लिये मैं आपका विशेष आभारी हूँ। लेख कितना गवेषणापूर्ण है उसे यहाँ न बतलाकर पाठकों के विचार पर ही छोड़ा जाता है। आशा है पाठक इसे गौर से पढ़ने की कृपा करेंगे। — सम्पादक (जुगलकिशोर मुख्तार ) जैन धर्म का मूल कोई भी विशिष्ट दर्शन हो या धर्मपंथ हो, उसकी आधारभूत उसके मूल प्रवर्तक पुरुष की एक खास दृष्टि होती है। जैसे शंकराचार्य की अपने मत निरूपण में ‘अद्वैत-दृष्टि’ और भगवान बुद्ध की अपने धर्म-पंथ-प्रवर्तन में ‘मध्यम-प्रतिपदा-मार्ग-दृष्टि’ खास दृष्टि है। जैन-दर्शन भारतीय दर्शनों में एक विशिष्ट दर्शन है और साथ ही एक विशिष्ट धर्म-पंथ भी है, इसलिये उसके प्रवर्तक और प्रचारक मुख्य पुरुषों की एक खास दृष्टि उसके मूल में होनी चाहिये और वह है भी। वही दृष्टि ‘अनेकान्तवाद’ कहलाती है। तात्त्विक जैन-विचारणा अथवा आचार विचार व्यवहार कुछ भी हो, वह सब अनेकान्तदृष्टि के आधार पर कि
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श्रीमान् पं० सुखलालजी. "The Limits of Anekāntavāda." अनेकान्त 1 (1930): 35–48.
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