Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
अनेकान्तवाद की मर्यादा
The Limits of Anekāntavāda
Anekāntavāda kī maryādā
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Epistemologyप्रमाणशास्त्र
The Development of the Jain System of Pramāṇa-mīmāṃsā
Jainoṃ kī pramāṇa mīmāṃsā paddhati kā vikāsa krama
आज तक तत्त्व-चिन्तकों ने ज्ञान-विचारणा एवं प्रमाण-मीमांसा में जो विकास किया है उसमें जैन दर्शन का कितना हाथ है? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिये जब जैन साहित्य को अधिक गहराई से देखा जाता है, तब हृदय में साश्चर्य आनन्द होने के साथ-साथ जैन तत्त्वचिन्तक महर्षियों के प्रति बहुमान हुए बिना नहीं रहता, और उनके तत्त्वचिन्तन मननरूप ज्ञानोपासना की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने के लिये मन ललचाता है। जैन साहित्य में ज्ञान-निरूपण की दो पद्धतियाँ नजर पड़ती हैं- पहली ‘आगमिक’ और दूसरी ‘तार्किक’। आगमिक पद्धति में मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्याय और केवल इस प्रकार पाँच भेद करके समग्र ज्ञानवृत्ति का वर्णन किया गया है। तार्किक पद्धति के दो प्रकार वर्णन किये गये हैं- (1) पहला प्रकार प्रत्यक्ष और परोक्ष इन दो भेदों का, और (2) दूसरा प्रकार प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम इन चार भेदों का है। पहली पद्धति को ‘आगमिक’ कहने के मुख्य कारण हैं:- (अ) एक तो यह कि, किसी भी जैनेतर दर्शन में प्रयुक्त नहीं हुए ऐसे मति, श्रुत, अवधि आदि ज्ञान विशेषवाची नामों द्वारा ज्ञान का निरूपण किया गया है; और (आ) दूसरा यह कि, जैन श्रुत के खास विभाग रूप कर्मशास्त्र में कर्म प्रकृतियों का जो वर्गीकरण है उसमें ज्ञानावरणीय कर्म के विभाग रूप से मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनः पर्यायज्ञानावरण, केवलज्ञानावरण (न कि प्रत्यक्षावरण, परोक्षावरण, अनुमानावरण, उपमानावरण आदि) ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं। दूसरी पद्धति को ‘तार्किक’ कहने के भी मुख्य दो कारण हैं:- (क) एक तो यह कि, उसमें प्रयुक्त हुए प्रत्यक्ष, परोक्ष, अनुमान, उपमान आदि शब्द न्याय, बौद्ध आदि जैनेतर दर्शनों में भी साधारण हैं; और (ख) दूसरे यह कि, प्रत्यक्ष, परोक्ष आदि र
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श्रीमान् पं० सुखलालजी. "The Development of the Jain System of Pramāṇa-mīmāṃsā." अनेकान्त 1 (1930): 340–362.
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Anekāntavāda kī maryādā