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Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
A View of the History of Anekānta
Anekānta ke itihāsa para eka dṛṣṭi
लोक में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें एक से अधिक गुण न हों। दूसरे शब्दों में यों कहिये कि अनेक गुणों के समुदाय का नाम ही वस्तु है। और यह प्रकट सत्य है। इतना ही सत्य यह भी है कि कोई भी मनुष्य वस्तु के संपूर्ण गुणों को एक साथ नहीं कह सकता। इसी कारण भाषा-विज्ञान में ‘सापेक्षवाद’ को स्थान मिलना स्वाभाविक है। वास्तव में, एक गुण का ही व्यक्त करके वस्तु की पूर्ण परिभाषा हुई मान लेना और उसी का आग्रह करना सत्य से दूर जा पड़ना है। यही एकान्त है और इसका मोह धार्मिक संसार में अपना महान् कटुफल दिखला चुका है। इसके विपरीत, वस्तु के अनेक गुणों को ध्यान में रखते हुए, एक समय में एक अपेक्षा को लेकर किसी एक गुण का प्रतिपादन करना और उस दृष्टि से उसे ठीक मानना सत्य का पा लेना है। इसी को विद्वान लोग ‘अनेकान्त’ के नाम से पुकारते हैं। अनेकान्त का महत्त्व एकान्त के अंधपक्ष को नाश करके सत्य का निरूपण करने में है। धार्मिक सिद्धान्त हों और चाहे लौकिक, अनेकान्त की तुला में तोलने से उनका ठीक-ठीक अन्दाज़ा हो जाता है और आपस में गलतफहमी तथा अप्रेम फैलने का कोई अवसर ही शेष नहीं रहता। कोई-कोई महाशय एकान्त को ग्रहण करके इस लोक के बिगाड़-बनाव की सारी जिम्मेदारी एक शुद्ध-बुद्ध निरंजन परमात्मा पर लाद कर छुट्टी पा लेते हैं और उसको बुरी निगाह से देखते हैं जो ऐसे ईश्वर के अस्तित्व से इनकार करता है। किन्तु एक अनेकान्तवादी इन दोनों के विपरीत सत्य की तह में पहुँच जाता है—वह अपेक्षा दृष्टि से काम लेता है और जानता है कि मूल में इस लोक के अभिनय का उत्तरदायित्व संसारी आत्मा पर ही है; किन्तु इतने से ही वह कर्तृत्ववादी पड़ोसी से लड़ता नहीं। वह सोचता है कि आखिर यह संसारी आत्मा ही तो शुद्ध-बुद्ध निरंजन परमात्मा होता है, जो आज इस सं
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श्रीयुत बा. कामताप्रसाद जी, सं. ‘वीर’. "A View of the History of Anekānta." अनेकान्त 1 (1930): 18–34.
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