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Where the Lokavibhāga Was Composed
Lokavibhāga kā racanā sthāna
सर्वनन्दिकृत ‘लोकविभाग’ जैनभूगोल का एक अच्छा प्राचीन ग्रन्थ है जिसके रचना-काल और रचना-स्थान का स्पष्ट उल्लेख सिंहसूरि के उपलब्ध लोक विभाग में निम्न प्रकार से पाया जाता है :- वैश्वे स्थिते रविसुते वृषभे च जीवे, राजोत्तरेषु सितपक्षमुपेत्य चन्द्रे। ग्रामे च पाटलि (क) नामनि पाणराष्ट्रे, शास्त्रं पुरा लिखितवान् मुनिसर्वनन्दी ।। 1 ।। संवत्सरे तु द्वाविंशे कांचीशसिंहवर्मणः। अशीत्यग्रे शकाब्दानां सिद्धमेतच्छतत्रये ॥ 2॥ अर्थात् - “जिस समय उत्तराषाढ़ नक्षत्र में शनिश्चर, वृषराशि में वृहस्पति और उत्तराफाल्गुनी में चन्द्रमा था, तथा शुक्लपक्ष था (अर्थात् फाल्गुन शुक्ला पूर्णिमा थी) उस समय पाणराष्ट्र के पाटलि ग्राम में इस शास्त्र को पहले सर्वनन्दी नामक मुनि ने लिखा। कांची के राजा सिंहवर्मा के 22वें संवत्सर में और शक के 380 वें वर्ष में यह ग्रंथ समाप्त हुआ।” यहाँ पद्य नं० 2 में प्रकृत ग्रन्थ का रचना-स्थान पाणराष्ट्र का पाटलि ग्राम लिखा है, जिसके विषय में श्रीयुत पं० नाथूरामजी प्रेमी ने “जैनहितैषी” भा० 13 पृ० 526 में आधुनिक पटना तथा प्राचीन पाटलिपुत्र की संभावना व्यक्त की थी। परन्तु हमने पाटलिपुत्र में पाणराष्ट्र का अस्तित्व न मिलने के कारण इस ग्राम को सिन्धुनदवर्ती पाटल ग्राम अनुमान किया था और वहीं एक पारणराष्ट्र का होना मान लिया था (वीर, वर्ष 5 पृ० 92)। अब हमें अपना यह मत भी ठीक नहीं मालूम होता। क्योंकि पाणराष्ट्र सिंधुदेश में न होकर कहीं कांची के आसपास होना चाहिये जहाँ के राजा और उसके राज्यकाल का इसमें उल्लेख है। सौभाग्य से प्रो० कृष्णस्वामी अयंगर की पुस्तक “सम कन्ट्रीव्यूशन्स आफ साउथ इन्डिया टू इन्डियन कलचर” के देखने से हमें इस स्थान का ठीक पता मिल गया है। उसमें पाणराष्ट्र को ‘बाण’ देश क
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श्रीयुत बा. कामताप्रसाद जी, सं. ‘वीर’. "Where the Lokavibhāga Was Composed." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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