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Vidyuccara
... प्रारंभ का अंश अनुपलब्ध है। जो धर्म का तत्त्व और अंश उस शास्त्र-विद्या में से भी इन्हें प्राप्त हो गया था, उसका मेल, इन्होंने देखा उस राजत्व से समीचीन रूप में नहीं होता जिसकी उनसे आशा की जाती है। और इसलिए, समझा, वह धर्म इष्ट नहीं है। जब सारी ही शिक्षाओं की दिशा राजत्व है, तब शास्त्र-विद्या के जिस थोड़े से अंश की दिशा वह नहीं जान पड़ती वह अंश अवश्य अनुपयुक्त और अनुपादेय है। वह व्यर्थ है। गुरु, पिता, समवयस्क साथी, सम्मान्य बुज़ुर्ग, सलाहकार, और समस्त पुरजन,—सब उसे सामने रखे ‘राजत्व’ की ओर ही ठेलते दीख पड़े। मानों सब उसमें ही प्रसन्न हैं। मानों वही उसके लिए एक मार्ग है वही धर्म है। जो उसके राजत्व के मार्ग से तनिक भी अलहदा है, थोड़ा भी विरुद्ध और भिन्न है,—वह मानों उसके लिए है ही नहीं। उस ओर की चिंता उसे करनी ही नहीं चाहिए। इस प्रकार सारी शिक्षा, और कुमार के चारों ओर फैली हुई सारी समाज ने, कुमार के लिए जीवन की राह-रूप एक रेखा ही रह जाने दी, जिसके अंत में और आरंभ में प्रतिष्ठित था— ‘राजत्व’। कुमार ने इस ‘राजत्व’ का विश्लेषण किया तो और ही पाया। देखा—वह एक ऐश्वर्य और प्रतिष्ठा का पद है, जहाँ विलास का हर तरह का सुभीता है, और स्वार्थ की हर प्रकार की सिद्धि है। यही पद और यही वैभव का आयोजन उसके लिए निर्णीत (Reserved) है। यहीं उसके कर्तव्य की इति और आरंभ है। और इस पर रीति की, औचित्य की, उपादेयता की और आवश्यकता की मुहर भी लगी हुई है। तो यह तो ठीक हो गया कि विलास शोध और स्वार्थ सिद्धि ही उसके लिए एक इष्ट तत्त्व है। क्योंकि सारा संसार उससे इसी की आशा और आकांक्षा रखता दीख पड़ता है। और वैसे खुद भी संसार उसी को अपना उद्देश्य बना कर व्यस्त रहता और उन्नति करता है। किन्तु संसार के औचित्य और न्याय्य
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जैनेन्द्रकुमार. "Vidyuccara." अनेकान्त 1 (1930): 49–52.
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