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Vidyuccara
(11) पद्म कुमार के बराबर ही पलंग पर बैठी है। वह अपनी योग्यता में संदेह नहीं करती। विनय और कनक ने चरणों के पास बैठकर ही अपना स्थान अधिकृत करना उचित समझा है। और रूप, विनय और कनक के बीच में, झूठ मूँठ अपना मुँह छिपाकर, ऐसी सिमटती हुई बैठी है कि मानों आधी विनय और कनक में बँट कर, लुप्त हो रहना चाहती है। सब स्तब्धता है। समय भी, जाते-जाते, मानों उत्सुक, अवसन्न इनकी बातचीत सुनने की प्रतीक्षा में ठैर गया है। बालाओं को बोल सूझता नहीं; और कुमार रूप पर विस्मित हो रहे हैं। - कैसी अल्हड़ है यह रूप! जब देखना और दीखना चाहिये तभी मुँह दुबकाती है! देखती नहीं तो अपने को ना दीखने दे, अपने को तो दिखाये! पर वह इन सब मोहनीय व्यापारों से, अपने अल्हड़पन में, विमुख होकर बैठ रही है! कुमार रूप के इस रूप पर विमुग्ध और मानों लुब्ध हैं। विमोह और लोभ से छुट्टी पायें तब तो कुछ कह पायें। उनकी दृष्टि शेष सब ओर से हठात् फिसल-फिसल कर, अवगुंठनावृत उसी मुख की ओर जाती है जो अपने को प्राणपण से उस दृष्टि से ओझल रखना चाहता है। पद्म, विनय और कनक जो आमंत्रण देती हुई, भोज्य से सजा कर अपना थाल लिये खड़ी हैं, जो थाल सामने ही, प्रणय से अभिषिक्त और आकाँक्षा से उद्दीप्त होते हुए, खुल्ले धरे हैं; जो बस यह जोह रहे हैं कि कब वे स्वीकृत हों और धन्य हों, - कुमार की दृष्टि उन पर पड़ती है, पर हट-हट कर, उस रूप के अवगुंठन का पार पाने की चेष्टा करने के लिये भाग छूटती है। यह मनुष्य का स्वभाव कैसा है? सहज-प्राप्य की प्राप्ति को रास्ते में ही छोड़कर वह क्यों अपनी चेष्टाएँ अप्राप्य और दुष्प्राप्य पर ही गाड़ता है? चेष्टाएँ जब व्यर्थ होती हैं, तभी वह क्यों सचेष्ट होता है? या चेष्टा को व्यर्थ करने के लिये ही सचेष्टता की आवश्यकता है? पर रूप अपने
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जैनेन्द्रकुमार. "Vidyuccara." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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