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Vidyuccara
(4) महीनों बीत गये। एक दिन उसी राजगृही नगरी में, विद्युच्चर को बड़ी धूमधाम दीख पड़ी। तोरण, बंदनवार, फूलमालाएँ और तरह-तरह के शृंगार पहिन कर मानों यह सुरनगरी अपना सौंदर्य सजाने बैठी है। सभी अंग-ग्रह, द्वार, हाट, बाट- आभूषित, अलंकृत होकर मानों खिलकर दिखाने में एक दूसरे से स्पर्धा कर रहे है। अद्भुत चहल-पहल है। आल्हाद का उफान सा आ गया है, मानों नगरी का आज सुहाग सम्पन्न हुआ है, और वह उसी का जय-समारोह मना रही है। मानों किसी की प्रतीक्षा में, उसका स्वागत और सत्कार करने को, उसे अपने हृदयासन पर अधिष्ठित करने को, प्रफुल्ल, आनन्द-मग्न, उसकी राह में अपने पाँवड़े बिछा कर बाट देख रही है। अलौकिक पुरुष कौन है?- वह कौन है? - यही जानने को उत्सुक होकर विद्युच्चर एक सम्पन्न सद्गृहस्थ बनकर, समारोह में पागल होते हुए पुरवासियों के बीच आया है। वह इससे पूछता है- वह प्रश्न पर विस्मय करके हँस देता है। उससे पूछता है - वह जवाब नहीं देता, चला जाता है, मानों प्रश्नकर्त्ता की अक्षम्य अजानकारी पर विस्मित ही नहीं क्षुब्ध भी है। फिर वह तीसरे से पूछता है-उससे भी उसे उत्तर नहीं मिलता, उपेक्षा मिलती है। सबसे पूछता है- सब उस पर हँस देते हैं। अब वह, अपने हृदय की सारी भूख से जान लेना चाहता है- वह अपरिमित भाग्यशाली कौन है? देखो, विद्युच्चर, वे सब लोग उत्कण्ठित होकर किधर को देखने लगे और भागने लगे! उसने ध्यान दिया - दूर से वाद्य का रव और भीड़ का रव जैसे उसी की ओर चला आ रहा है। लोग सब उसी रव की ओर भागे जा रहे हैं। वह वहीं प्रतीक्षा में ठैर गया। जुलूस आया। पहले ऊँटों पर जय-ध्वज फैराते हुए चारण आये। फिर तुरही वाले। उसके बाद पदातिसेना। फिर अश्वारोही। अनंतर हाथियों पर राज्य के आमात्यवर्ग की सवारी आई। उनके बीच में ही, विद्यु
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जैनेन्द्रकुमार. "Vidyuccara." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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