Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
भगवान महावीर और उनका समय
Lord Mahāvīra and His Times
Bhagavāna Mahāvīra aura unakā samaya
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Jain Poets of Karnataka
Karṇāṭaka Jaina-kavi
19 वर्द्धमान (लगभग ई० सन् 1600) नगर ताल्लुके के 46 वें शिलालेख से मालूम होता है कि उसका लेखक कवि वर्द्धमान (मुनि) है। शिलालेख में कनड़ी और संस्कृत इन दोनों ही भाषाओं के पद्य हैं। प्रारंभ में अभिनव वादिविद्यानन्द की स्तुति करके कवि ने अपनी परम्परा इस प्रकार दी है-राजा कृष्णदेव (ई० स० 1509-29) की सभा में वादिजनों को पराजित करने वाले अभिनव वादिविद्यानन्द, उनके पुत्र विशालकीर्ति, विशालकीर्ति के पुत्र देवेन्द्रकीर्ति, जिनकी पूजा भैरवेन्द्र वंश के पाण्ड्य राजा ने की और देवेन्द्रकीर्ति का पुत्र कवि वर्द्धमान। इसका समय 1600 के लगभग होना चाहिए। 20 श्रृङ्गारकवि राजहंस (ल० 1600) इसने ‘रत्नाकराधीश्वर-शतक’ नामक ग्रंथ की रचना की है, जिसमें 125 वृत्त हैं और इसका प्रत्येक पद्य ‘रत्नाकराधीश्वर’ इस शब्द पर समाप्त होता है। यह ग्रंथ मुद्रित हो चुका है। इस कवि ने अपने पूर्ववर्ती कवि ‘मधुर’ (1385) का स्मरण किया है। इसके गुरु का नाम देवेन्द्रकीर्ति है और श्रवणबेलगोल की एक पोथी से मालूम होता है कि देवेन्द्रकीर्ति का समय 1614 होना चाहिए। बहुतों का ख़याल है कि इस शतक का कर्त्ता रत्नाकरवर्णी है; परन्तु यह ठीक नहीं जान पड़ता। क्योंकि रत्नाकरवर्णी के गुरु चारुकीर्ति और हंसराज के गुरु देवेन्द्रकीर्ति ने अग्गल, नेमिचंद्र, रन्न, कुमुदेन्दु, मधुर और जिनाचार्य का स्मरण किया है। 21 देवोत्तम (ल० 1600) इसका बनाया हुआ ‘नानार्थरत्नाकर’ नाम का ग्रंथ है, जिसमें संस्कृत शब्दों के नाना अर्थ बतलाये गये हैं। 169 पद्यों में यह समाप्त हुआ है। इसमें इस कवि ने अपने पूर्ववर्ती निघण्टुकारों के नाम नीचे लिखे पद्य में प्रकट किये हैं- निजगोपाल धनंजया भिनवमाचं भागुरीनागव मजियंतामर शब्दमञ्जरी बलायुक्ताभिधानार्थमम् इस पद्य में जिस
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श्रीयुत पं० नाथूरामजी प्रेमी. "Jain Poets of Karnataka." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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