Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
भगवान महावीर और उनका समय
Lord Mahāvīra and His Times
Bhagavāna Mahāvīra aura unakā samaya
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Jain Poets of Karnataka
Karṇāṭaka Jaina-kavi
[अठारह वर्ष के क़रीब हुए जब ‘कर्णाटक-जैनकवि’ नाम की एक लेखमाला जैनहितैषी में सुहृद्वर पं० नाथूरामजी प्रेमी ने निकालनी प्रारम्भ की थी। यह लेखमाला प्रायः मेसर्स आर० तथा एस० जी० नरसिंहाचार्य-रचित ‘कर्णाटक-कविचरिते’ नामक कनडी ग्रन्थ के प्रथम भाग के आधार पर लिखी गई थी, जो उस वक्त तक प्रकाश में आया था। और उसमें ईसवी सन् की दूसरी शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी तक के 75 जैन कवियों का संक्षिप्त परिचय दिया गया था, जो कि पुरातत्त्व के खोजियों तथा अनुसन्धानप्रिय व्यक्तियों को बहुत ही रुचिकर हुआ था - हिन्दी संसार के लिये तो वह बिलकुल ही नई चीज़ थी - और बंगला भाषा के ‘ढाकारिव्यू’ जैसे पत्रों ने जिसका अनुवाद भी निकाला था और उसे बड़े ही महत्व की चीज समझा था। आज, जब कि उक्त ‘कर्णाटक-कविचरित’ का दूसरा भाग प्रकाशित हो चुका है, उसी लेखमाला का यह दूसरा भाग ‘अनेकांत’ के पाठकों की भेट किया जाता है। इसे हाल में पं० नाथूरामजी की प्रेरणा पर ‘कर्णाटक-कविचरिते’ के द्वितीय भाग पर से श्रीयुत ए. एन. उपाध्याय बी. ए. महाशय ने मराठी भाषा में संकलित किया था, उसी पर से यह हिन्दी अनुवाद पं० नाथूरामजी प्रेमी ने प्रस्तुत किया है। प्रेमीजी लिखते हैं कि “उपाध्यायजी बड़े होनहार हैं, पूने में एम. ए. में पढ़ रहे हैं और जैन साहित्य तथा इतिहास में आपको बहुत प्रेम है।” अनेकान्त में इस लेख माला के लिये प्रेमीजी, उपाध्यायजी और ‘कर्णाटक-कविचरिते’ के मूल लेखक तीनों ही धन्यवाद के पात्र हैं। यद्यपि उस लेखमाला में कवियों का बहुत ही संक्षिप्त परिचय दिया गया है - विशेष परिचय भी पाया जाता है और इसे संकलित करने की जरूरत है - फिर भी इस पर से पाठकों को बहुत सी नई नई बातें मालूम होंगी और इतिहास तथा पुरातत्त्व विषय में उनका कितना ही अनुभ
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श्री० पं० नाथूरामजी प्रेमी. "Jain Poets of Karnataka." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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