Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
भगवान महावीर और उनका समय
Lord Mahāvīra and His Times
Bhagavāna Mahāvīra aura unakā samaya
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Bhāmāśāh, Restorer of Mewar
Mevāḍoddhāraka Bhāmāśāha
अयोध्याप्रसाद गोयलीय स्वाधीनता की लीलास्थली वीर-प्रसवा मेवाड़-भूमि के इतिहास में भामाशाह का नाम स्वर्णाक्षरों में अङ्कित है। हलदीघाटी का युद्ध कैसा भयानक हुआ, यह पाठकों ने मेवाड़ के इतिहास में पढ़ा होगा। इसी युद्ध में राणा प्रताप की ओर से वीर भामाशाह और उसका भाई ताराचन्द भी लड़ा था। 21 हजार राजपूतों ने असंख्य यवन-सेना के साथ युद्ध करके स्वतंत्रता की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी, किन्तु दुर्भाग्य कि वे मेवाड़ को यवनों द्वारा पद्दलित होने से न बचा सके। समस्त मेवाड़ पर यवनों का आतंक छा गया। युद्ध-परित्याग करने पर राणा प्रताप मेवाड़ का पुनरुद्धार करने की प्रबल आकांक्षा को लिये हुये वीरान जंगलों में भटकते फिरते थे। उनके ऐशोआराम में पलने योग्य बच्चे भोजन के लिये उनके चारों तरफ़ रोते रहते थे। उनके रहने के लिये कोई सुरक्षित स्थान न था। अत्याचारी मुगलों के आक्रमणों के कारण बना बनाया भोजन राणाजी को पाँच बार छोड़ना पड़ा था। इतने पर भी आन पर मर मिटने वाले समर-केसरी प्रताप विचलित नहीं हुए। वह अपने पुत्रों और सम्बन्धियों को प्रसन्नतापूर्वक रणक्षेत्र में अपने साथ रहते हुये देख कर यही कहा करते थे कि राजपूतों का जन्म ही इस लिये होता है। परन्तु उस पर्वत जैसे स्थिर मनुष्य को भी आपत्तियों के तीव्र थपेड़ोंने विचलित कर दिया। एक समय जंगली अन्न के आटे की रोटियां बनाई गई, और प्रत्येक के भाग में एक-एक रोटी - आधी उस समय के लिये और आधी दूसरे समय के लिये - आई। राणा प्रताप राजनैतिक पेचीदा उलझनों को सुलझाने में व्यस्त थे, मातृभूमि की परतंत्रता के दुख से दुःखी होकर गर्म निश्वास छोड़ रहे थे कि, इतने में लड़की के हृदयभेदी चीत्कार ने उन्हें चौंका दिया। बात यह हुई कि एक जंगली बिल्ली लड़की की रक्खी हुई रोटी
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[author not identified]. "Bhāmāśāh, Restorer of Mewar." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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The Limits of Anekāntavāda
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