Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
भगवान महावीर और उनका समय
Lord Mahāvīra and His Times
Bhagavāna Mahāvīra aura unakā samaya
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Svāmī Pātrakesarī and Vidyānanda
Svāmī Pātrakesarī aura Vidyānanda
जुगलकिशोर मुख्तार एकता के भ्रम का प्रचार सोलह सत्रह वर्ष हुए जब सुहृद्दर पं० नाथूरामजी प्रेमी ने ‘स्याद्वाद विद्यापति विद्यानन्द’ नामक एक लेख लिखा था और उसे 9वें वर्ष के जैनहितैषी अंक नं० 5 में प्रकाशित किया था। यह लेख प्रायः तात्या नेमिनाथ पाँगल के मराठी लेख के आधार पर, उसमें कुछ संशोधित, परिवर्तित और परिवर्द्धित करके लिखा गया था। और उसमें यह सिद्ध किया गया था कि ‘पात्रकेसरी’ और ‘विद्यानन्द’ दोनों एक ही व्यक्ति हैं। जिन प्रमाणों से यह सिद्ध किया गया था उनकी सत्यता पर विश्वास करते हुए, उस वक्त के प्रायः सभी विद्वान् यह मानते आ रहे हैं कि ये दोनों एक ही व्यक्ति के नामान्तर हैं—भिन्न नाम हैं। चुनाँचे उस वक्त से आप्तपरीक्षा, पत्रपरीक्षा, अष्टसहस्री, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, युक्त्यनुशासनटीका, पात्रकेसरीस्तोत्र, श्रीपुरपार्श्वनाथस्तोत्र आदि जो भी ग्रंथ विद्यानन्द या पात्रकेसरी के नाम से प्रकाशित हुए हैं और जिनके माथे में विद्वानों द्वारा उनके कर्त्ता का परिचय दिया गया है, उन सबमें पात्रकेसरी और विद्यानन्द को एक घोषित किया गया है—बहुतों में प्रेमीजी के लेख का सारांश अथवा संस्कृत अनुवाद तक दिया गया है। डॉ० सतीशचन्द्र विद्याभूषण जैसे अजैन विद्वानों ने भी, बिना किसी विशेष ऊहापोह के, अपने ग्रन्थों में दोनों की एकता को स्वीकार किया है। इस तरह पर यह विषय विद्वत्समाज में रूढ़ सा हो गया है, और एक निश्चित विषय समझा जाता है। परन्तु खोज करने पर मालूम हुआ कि ऐसा समझना नितान्त भ्रम है। और इसलिए आज हम इस भ्रम को स्पष्ट करने के लिये ही यह लेख लिख रहे हैं। प्रमाण-पंचक सबसे पहले मैं अपने पाठकों को उन प्रमाण—अथवा हेतुओं—का परिचय करा देना चाहता हूँ जो प्रेमीजी ने अपने उक्त लेख में दिये हैं, और वे इस
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[author not identified]. "Svāmī Pātrakesarī and Vidyānanda." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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The Limits of Anekāntavāda
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