Metaphysicsतत्त्वमीमांसा
भगवान महावीर और उनका समय
Lord Mahāvīra and His Times
Bhagavāna Mahāvīra aura unakā samaya
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Personality
Vyaktitva
“त्रुटिपूर्ण व्यक्तित्व प्रत्येक स्थान पर हानिकारक होता है।” - निटशे। व्यक्तित्व की शक्ति और महत्ता के विषय में जितना भी कहा जाय थोड़ा है। यह सारी सफलताओं का आधार और सारी सफलताओं की जड़ है। स्त्रियों और पुरुषों को आप संसार के किसी भी क्षेत्र में देखिये, व्यक्तित्व के बिना वे प्रत्येक स्थान में असफल होते हैं, उनकी मनोकामनाएँ पूरी नहीं होतीं। फिर यह कितने आश्चर्य की बात है कि हम अपने व्यक्तित्व को समझने की पर्वाह ही नहीं करते, इस ओर ध्यान ही नहीं देते। माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा पर खूब धन लुटाते हैं, परन्तु क्या उन्होंने कभी इस बात को सोचने की चिन्ता भी की कि, जिसे वे लोग शिक्षा समझते हैं वह वास्तव में क्या वस्तु है? यदि जरा भी बाहरी दृष्टि से देखा जाय और कुछ विचार किया जाय तो मालूम होगा, कि बच्चों और नवयुवकों को ऐसी ऐसी बातें रटा देना ही आधुनिक शिक्षा है, जिनका आदमी के असली जीवन से या तो बिल्कुल ही सम्बन्ध नहीं होता अथवा बहुत ही कम सम्बन्ध होता है। कभी-कभी तो यह भी देखा गया है, कि इस शिक्षा के देते समय बच्चों के व्यक्तित्व के चिन्हों को ही दबा दिया जाता है और उन्हें कृत्रिम सहायताओं, परावलम्बनों और निर्बल सहारों के भरोसे से पीछे फेंक दिया जाता है। बच्चों को आरम्भ से ही इस प्रकार जकड़ दिया जाता है और इस प्रकार के शब्द हर वक्त उनसे कहे जाते हैं जिससे उनकी शक्तियों का पूर्णरूप से विकास ही नहीं होने पाता है। इस प्रकार का व्यवहार बच्चों की आत्माओं के उस भाग को नष्ट कर देता है, जिसे व्यक्तित्व कहा जा सकता है। जिस प्रकार एक मूर्ख माली एक पौदे को बार-बार काट कर उसे बढ़ने नहीं देता उसी प्रकार यदि दूसरे आदमियों द्वारा बच्चों का हर समय विरोध किया जाय और उन्हें अपनी आन्तरिक न्याय-बुद
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श्री० बाबू माईदयालजी जैन बी.ए.. "Personality." अनेकान्त 1 (1930): [page range not recorded].
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The Limits of Anekāntavāda
Anekāntavāda kī maryādā